(1) मरीचि के पुत्र कश्यप प्रजापति थे। ब्रह्मदेव की दाहिनी हाथ की बोटे की नली से दक्ष नाम का पुरुष और बाएँ हाथ की बोटे की नली से धरनी नाम की स्त्री जन्मीं। उन दोनों से एक हज़ार-हज़ार महा ऋषि जन्मे। (2) ब्रह्मा के मानस पुत्रों में दूसरे स्थान पर रहने वाले अंगिरस्‍ु को उद्दध्य, बृहस्पति और संवर्त जैसे पुत्र हुए। बृहस्पति देवताओं के आचार्य बने। (3) मैत्रि (अत्रि) नामक मानस पुत्र से अनेक महा मुनि जन्मे। (4) पुलस्त्य नामक ब्रह्मा के मानस पुत्र से राक्षसों का जन्म हुआ। (5) पुलह नामक मानस पुत्र से किन्नर और किमपुरुष वर्ग उत्पन्न हुए। (6) क्रतू नामक मानस पुत्र से पक्षियों की जाति उत्पन्न हुई।

   
    

शान्तिपर्व (Mahabharat) - 12. शान्तिपर्व(महाभारत)


॥ श्रीः ॥
12.168. अध्यायः 168
Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Topics
कदाचन धनार्जनाय प्रस्थितवता गौतमेन समुद्रंप्रति गच्छता वणिक्सार्थेन सह गमनम्॥ 1॥ वनगजोपद्रुतवणिक्सार्थपरिभ्रष्टेन गौतमेन किंचिक्यग्रोधमूले विश्रान्त्यै प्रस्वापः॥ 2॥ तत्र सायमागतेन राजधर्मनाम्ना वकराजेन तस्य सत्कारः॥ 3॥


Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Text

भीष्म उवाच। 12-168-0x(5857)(71728)
तस्यां निशायां व्युष्टायां गते तस्मिन्द्विजोत्तमे।
निष्क्रम्य गौतमोऽगच्छद्धनार्थी विचचार ह॥ 12-168-1(71729)
सामुद्रिकान्सवणिजस्ततोऽपश्यत्स्थितान्पथि।
स तेन सह सार्थेन प्रययौ सागरं प्रति॥ 12-168-2(71730)
स तु सार्थो महाराज कस्मिंश्चिद्गिरिगह्वरे।
मत्तेन द्विरदेनाथ निहतः प्रायशोऽभवत्॥ 12-168-3(71731)
स कथंचिद्भयात्तस्माद्विमुक्तो प्रायशोऽभवत्।
कांदिग्भूतो जीवितार्थी प्रदुद्रावोत्तरां दिशम्॥ 12-168-4(71732)
ततस्तु स परिभ्रष्टः सार्थाद्देशात्तथाऽर्थतः।
एकाकी व्यभ्रमत्तत्र वने कापुरुषो यथा॥ 12-168-5(71733)
स पन्थानमथासाद्य समुद्राभिसरं तदा।
आससाद वनं रम्यं महत्पुष्पितपादपम्॥ 12-168-6(71734)
सर्वर्तुकैराम्रवणैः पुष्पितैरुपशोभितम्।
नन्दनोद्देशसदृशं यक्षकिन्नरसेवितम्॥ 12-168-7(71735)
सालतालघवाश्वत्थप्लक्षागुरुवनैस्तथा।
चन्दनस्य च मुख्यस्य पादपैरुपशोभितम्।
गिरिप्रस्थेषु रम्येषु सुखेषु सुखगन्धिषु॥ 12-168-8(71736)
समन्ततो द्विजश्रेष्ठा वल्गु कूजन्ति तत्र वै।
मनुष्यवदनाश्चान्ये भारुण्डा इति विश्रुताः॥ 12-168-9(71737)
स तान्यतिमनोज्ञानि विहगानां रुतानि वै।
शृण्वन्सुरमणीयानि विप्रोऽगच्छत गौतमः॥ 12-168-10(71738)
ततोऽपश्यत्सुरम्येषु सुवर्णसिकताचिते।
देशभागे समे चित्रे स्वर्गोद्देशसमप्रभे।
श्रिया जुष्टं ददर्शाथ न्यग्रोधं च सुमण्डलम्॥ 12-168-11(71739)
शाखाभिरनुरूपाभिः संवृतं छत्रसन्निभम्।
तस्य मूलं च संसिक्तं वरचन्दनवारिणा॥ 12-168-12(71740)
दिव्यपुष्पान्वितं श्रीमत्पितामहसदोपमम्।
तं दृष्ट्वा गौतमः प्रीतो मनःकान्तमनुत्तमम्॥ 12-168-13(71741)
मेध्यं सुरगृहप्रख्यं पुष्पितैः पादपैर्वृतम्।
तमासाद्य मुदा युक्तस्तस्याधस्तादुपाविशत्॥ 12-168-14(71742)
तत्रासीनस्य कौन्तेय गौतमस्य नराधिप।
पुष्पाणि समुपस्पृश्य प्रववावनिलः शुभः।
ह्लादयंस्तस्य गात्राणि गौतमस्य तदा नृप॥ 12-168-15(71743)
स तु विप्रः परिश्रान्तिः स्पृष्टः पुण्येन वायुना।
सुखमासाद्य सुष्वाप भास्करश्चास्तमभ्ययात्॥ 12-168-16(71744)
ततोऽस्तं भास्करे याते सन्ध्याकाल उपस्थिते।
आजगाम स्वभवनं ब्रह्मलोकात्खगोत्तमः॥ 12-168-17(71745)
नाडीजङ्घ इति ख्यातो दयितो ब्रह्मणः सखा।
बकराजो महाप्राज्ञः काश्यपस्यात्मसंभवः॥ 12-168-18(71746)
राजधर्मेति विख्यातो बभूवाप्रतिभो भुवि।
देवकन्यासुतः श्रीमान्विद्वान्देवसमप्रभः॥ 12-168-19(71747)
मृष्टहाटकसंछन्नो भूषणैरर्कसन्निभैः।
भूषितः सर्वगात्रेषु देवगर्भः श्रिया ज्वलन्॥ 12-168-20(71748)
तमागतं खगं दृष्ट्वा गौतमो विस्मितोऽभवत्।
क्षुत्पिपासापरीतात्मा हिंसार्थं चैनमैक्षत॥ 12-168-21(71749)
राजधर्मोवाच। 12-168-22x(5858)
स्वागतं भवतो विप्र दिष्ट्या प्राप्तोऽसि मे गृहान्।
अस्तं च सविता यातः संध्येयं समुपस्थिता॥ 12-168-22(71750)
मम त्वं निलयं प्राप्तः प्रियातिथिरनिन्दितः।
पूजितो यास्यसि प्रातर्विधिदृष्टेन कर्मणा॥ ॥ 12-168-23(71751)

इति श्रीमन्महाभारते शान्तिपर्वणि आपद्धर्मपर्वणि अष्टषष्ट्यधिकशततमोऽध्यायः॥ 168॥

Mahabharata - Shanti Parva - Chapter Footnotes

12-168-2 सामुद्रिकान् समुद्रोपान्ते गतान्॥ 12-168-4 कां दिशं प्रयामीत्याकुलः कांदिग्भूतः॥ 12-168-11 रम्येषु प्रदेशेषु मध्ये एकत्र॥ 12-168-13 सभोपममिति झ. पाठः॥


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